जो प्राप्त है वो पर्याप्त है। 

जो प्राप्त है वो पर्याप्त है।
सन्तुष्टि को शांति का आधार माना जा सकता है। परिश्रम करना, कर्म करना जीवन का आधार है। इच्छा करना, चाह रखना कोई अपराध नहीं किन्तु अति की तृष्णा, अति की इच्छायें कदाचित एक अमिट भूख के समान होने लगती हैं जो सरलता से शांत नहीं होती, मनुष्य अधीर, असन्तुष्ट, विचलित सा आभास करने लगता है। स्मरण रखना चाहिए कि जिस अवस्था में मनुष्य स्वयं को असन्तुष्ट पाता है, दुःखी पाता है, न जाने कितने ही लोग उस अवस्था के लिये तरसते हैं, ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। लक्ष्य-पूर्ति हेतु प्रयास अवश्य करते रहें किन्तु अपनी वर्तमान स्थिति में एक सन्तुष्टि का, धन्यवाद का भाव ईश्वर को अवश्य समर्पित करते रहें…!! 

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