संघर्ष से बड़ी शक्ति नहीं…

द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति नियुक्त हुए। पहले दिन का युद्ध वीरतापूर्वक लड़े तो भी विजयश्री अर्जुन के हाथ रही।यह देखकर दुर्योधन को बड़ी निराशा हुई। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गए और कहा-गुरुदेव अर्जुन तो आपका शिष्य मात्र है, आप तो उसे क्षणभर में परास्त कर सकते हैं, फिर यह देर क्यों?’’
द्रोणाचार्य गंभीर हो गए और कहा-आप ठीक कहते हैं, अर्जुन मेरा शिष्य है, उसकी सारी विद्या से मैं परिचित हूँ, किंतु उसका जीवन कठिनाई से संघर्ष करने में रहा है और मेरा सुविधापूर्वक दिन बिताने का रहा है। विपत्ति ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया है।’’

0

Article Categories:
VISHWAS
Likes:
0

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *